Bajrangbali : ज्येष्ठ के बड़े मंगल की जानें महत्व और इतिहास बेहद शुभ योग में हो रहे हैं शुरू.

17 मई से शुरू होने वाला ज्येष्ठ माह 14 जून तक चलेगा। इस बार खास बात यह है कि माह का आगाज और समापन मंगलवार को ही होगा। पहले मंगलवार को नारद जयंती, जबकि अंतिम मंगल को पूर्णिमा पड़ रही है। यही नहीं इस बार बजरंगबली की स्तुति करने के लिए पांच बड़े मंगल भी मिलेंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 17, 24 और 31 मई के साथ ही 7 जून और 14 जून को मंगलवरीय पूजन होंगे। अब भक्तगण शनिवारीय पूजन ज्येष्ठ माह में करने लगे हैं। ऐसे में 21, 28 मई के साथ ही 4 और 11 जून को शनिवारीय ज्येष्ठ माह के पूजन किए जा सकेंगे।

इसलिए मनाया जाता है ज्येष्ठ मंगल
ज्येष्ठ माह के हर मंगल को कई मंदिरों के साथ ही अन्य स्थानों पर भंडारे लगाए जाते हैं। इस माह के मंगलवार को हनुमानजी की पूजा और व्रत करने से घर में सुख-शांति आती है और आसपास मौजूद सभी नकारात्मक शक्तियों का अंत होता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्रीराम और हनुमानजी की पहली मुलाकात ज्येष्ठ माह में मंगल के दिन ही हुई थी। इसलिए ज्येष्ठ माह के मंगलवार को महत्व है और इसलिए इस दिन को बड़े मंगल के तौर पर मनाया जाता है। बड़े मंगल के दिन बजरंग बाण और सुंदरकांड का पाठ करने से हर संकट दूर होते हैं।

बड़ा मंगल मनाने का इतिहास
ज्येष्ठ माह के मंगलवार को हनुमानजी की पूजा-अर्चना करने से आरोग्य का वरदान प्राप्त होता है। इसलिए इसे बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल कहते हैं। इस पर्व को हिंदू और मुस्लिम मिलकर बनाते हैं। बताया जाता है कि बड़े मंगल की शुरुआत 400 साल पहले अवध के नवाब ने की थी। नवाब मोहम्मद अली शाह के बेटे गंभीर रूप से बीमार थे। उनकी बेगम ने कई जगह उसका इलाज करवाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। लोगों ने नवाब और उनकी बेगम को बेटे की सलामती के लिए लखनऊ के अलीगंज स्थित पुराने हनुमान मंदिर में मन्नत मांगने को कहा। नवाब के मन्नत मांगने पर बेटा पूरी तरह स्वस्थ हो गया। इसके बाद नवाब और बेगम ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इसके साथ ही ज्येष्ठ की भीषण गर्मी में हर मंगलवार को पूरे शहर में पानी और गुड़ वितरण करवाया, जिसके बाद से बड़ा मंगल मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

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16 मई को त्रिविधपावनी बुद्ध पूर्णिमा
वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को त्रिविधपावनी बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस बार यह तिथि 16 मई दिन सोमवार को है। त्रिविधपावनी का अर्थ होता है कि तीनों रूपों में पावन। राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था और ज्ञान की प्राप्ति भी वैशाख पूर्णिमा तिथि को ही हुई थी। इसके साथ ही महापरिनिर्वाण भी वैशाख पूर्णिमा को हुआ था।